नई दिल्ली। चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने अब दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) में अक्साई चिन से महज 7 किमी. दूर करीब 50 हजार सैनिकों की तैनाती कर दी है। इससे एक बात साफ हो गई है कि चीन न केवल लद्दाख बल्कि अक्साई चिन में भी बड़े मिशन पर है। चीन पहले से ही डेप्सांग और दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) में नया मोर्चा खोलने के लिए बेताब दिख रहा था लेकिन अब चीनी सैनिकों की तैनाती से उसके इरादे और साफ होने लगे हैं। इस बार सरकार और सशस्त्र बल सतर्क हैं और कोई गलती नहीं करना चाहते हैं। इसीलिए भारत ने अपने परमाणु हथियारों को पाकिस्तान के अलावा चीन सीमा पर भी स्थानांतरित कर दिया है। यानी अब चीन की राजधानी बीजिंग और अन्य चीनी शहर भारतीय परमाणु मिसाइलों की जद में आ गए हैं। 
भारत ने पहले से ही दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) में पेट्रोलिंग प्वाइंट-14, 15, 16, 17 और पैंगोंग झील के फिंगर इलाके में बख्तरबंद सैनिकों, पैदल सेना के लड़ाकू वाहनों, एम-777 हॉवित्जर तोपों की तैनाती कर रखी थी। अब चीनी सेना की नई तैनाती के जवाब में पहली बार भारतीय सेना ने भी एक स्क्वाड्रन यानी ​​12 टी-90 मिसाइल फायरिंग टैंक, बख्तरबंद और एक पूर्ण टुकड़ी ब्रिगेड को तैनात किया है। भारत ने काराकोरम पास पर चीन के किसी भी दुस्साहस को रोकने के लिए 4,000 बख्तरबंद सैनिकों को डीबीओ (काराकोरम पास के निकट अंतिम चौकी) में स्थानांतरित कर दिया है। इसके साथ ही भारतीय सेना न केवल सैन्य ताकत का मिलान कर रही है, बल्कि अक्साई चिन में टैंक, वायु रक्षा रडार और हवाई मिसाइलों की सतह पर पीएलए की तैनाती को भी उत्सुकता से देख रही है।
इस बार सरकार और सशस्त्र बल सतर्क हैं और कोई गलती नहीं करना चाहते हैं। एक बड़े रणनीतिक कदम के तहत भारत ने अपने परमाणु हथियारों को पाकिस्तान के अलावा चीन सीमा पर भी स्थानांतरित कर दिया है। ​भारत ने चीन सीमा पर 5 हजार किलोमीटर तक के दायरे में इस्तेमाल की जाने वाली ​​अग्नि मिसाइल तैनात की है जो परमाणु हथियारों से लैस होकर 1 टन पेलोड ले जाने में सक्षम है।​ ​​यानी अब चीन की राजधानी बीजिंग और अन्य चीनी शहर भारतीय परमाणु मिसाइलों की जद में आ गए हैं।​ अग्नि पांच के लॉन्चिंग सिस्टम में कैनिस्टर तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।​इस​​की वजह से इस मिसाइल को कहीं भी बड़ी आसानी से ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है, जिससे हम अपने दुश्मन के करीब पहुंच सकते हैं। 
दरअसल चीन ने पहले ही भारतीय सीमा में लगभग 12 किमी. अंदर आकर लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल ( एलएसी) के पास डेप्सांग घाटी में सैनिकों को जुटाकर भारत के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। चीनियों ने यहां पर नए शिविर और वाहनों के लिए ट्रैक बनाए हैं, जिसकी पुष्टि सेटेलाइट की तस्वीरों और जमीनी ट्रैकिंग के जरिये भी हुई है। इसके अलावा बड़ी तादाद में सैनिक, गाड़ियां और स्पेशल एक्यूपमेंट इकठ्ठा किया है। पूर्वी लद्दाख का डेप्सांग प्लेन्स भारत-चीन सीमा के सामरिक दर्रे काराकोरम पास के बेहद करीब है। डेप्सांग घाटी के पास ही दुनिया की सबसे ऊंची हवाई पट्टी दौलत बेग ओल्डी है जिसे भारतीय वायुसेना ने बनाया है। यहां से चीन के कब्जे वाला अक्साई चिन क्षेत्र लगभग 7 किमी. दूर है।अब चीनी सेना ने यहीं पर करीब 50 हजार सैनिकों की तैनाती कर दी है। दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) चीन सीमा पर भारत की अंतिम चौकी है, जो 16 हजार फीट की ऊंचाई पर काराकोरम दर्रे के दक्षिण में और गलवान-श्योक नदी के संगम के उत्तर में स्थित है।
सामरिक दर्रे काराकोरम पास पर 50 हजार सैनिकों की तैनाती करके चीन अपने कब्जे वाले अक्साई चिन क्षेत्र से लगभग 7 किमी. दूर रह गया है। अक्साई चिन जम्मू-कश्मीर का वह हिस्सा है, जिसमें जम्मू-कश्मीर का 15 फीसदी हिस्सा आता है। अक्साई चिन को 1950 से ही चीन ने अपने कब्जे में कर रखा है और सन 1962 के युद्ध में कब्ज़ा जमा लिया था। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाते समय भी संसद में गृहमन्त्री अमित शाह ने इसे जम्मू-कश्मीर का हिस्सा कहा था। चीनी सेना धीरे-धीरे एलएसी यानी लाइन ऑफ एक्चयुल कंट्रोल को पश्चिम की तरफ धकेलना चाहती है ताकि डेप्सांग प्लेन्स के कुछ इलाकों में उसका कब्जा बना रहे। इसी चालबाजी के तहत चीनी सेना सामरिक दर्रे काराकोरम पास के कुल पांच पेट्रोलिंग प्वाइंट (पीपी) 10, 11, 11ए, 12 और 13 पर भारतीय सैनिकों को गश्त करने से लगातार रोक रही है। 
अब चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) में अक्साई चिन से महज 7 किमी. दूर करीब 50 हजार सैनिकों की तैनाती करने से एक बात साफ हो गई है कि चीन न केवल लद्दाख बल्कि अक्साई चिन के भी बड़े मिशन पर है। ऐसा लगता है कि चीन युद्ध की तैयारी कर रहा है, क्योंकि बीजिंग में पोस्टर लगाए जा रहे हैं, जिसमें बताया जा रहा है कि अलार्म बजने पर भूमिगत वायु रक्षा सुविधाओं में कैसे आना है। जानकारी यह भी है कि पाकिस्तान और चीन की दोस्ती काम कर रही है, क्योंकि पाकिस्तानी सेना भारत के साथ 1965, 1971, 1984 और 1999 में हार के अपने अनुभव चीनी सेना के साथ साझा कर रही है। 

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